हे राम ! जरा तुम ही बताओ
तेरी राम खड़ाऊँ कहाँ गयी
इस कलि काल की दुनिया में
सगे सम्बंधी आज हुये बेमानी ।
कर रहे छल कपट आपस में
नीति धर्म सब विलुप्त हुये
भरत ने राज सिंहासन हड़पा
कर रहे वे अपनी मनमानी ।
कैकेयी खड़ी अट्टहास कर रही
कौशल्या हुई घर से निर्वासित
राजा दशरथ कुछ कर न पाये
पुत्र राम को कर गये बेगानी ।
गुरू जी आज मिल गये भरत से
मलाई मिलकर दोनों काट रहे
राज सत्ता के साथ वे चिपके
मन में व्याप्त है उनके बेईमानी ।
वन वन भटक रहे प्रभु राम
अलग थलग हैं आज पड़े हुये
लक्ष्मण ने भी किया किनारा
शत्रुघ्न ने भी बात नही मानी ।
रावण ने हर लिया सिया को
राम कर रहें वन वन क्रंदन
श्रृष्य मूक पर्वत भी रहा सूना
हनुमान ने नहीं सुनी वाणी ।
वानर सेना भी नही साथ
बालि ने बदला चुकाया है
खड़ा हुआ वह रावण संग
द्वद युद्ध की है आज ठानी ।
शरण प्रभु की छोड़ आज
विभीषण ने भी पाला बदला
धर्म युद्ध अब रहा कहाँ
प्रकृति हुई सबकी अभिमानी ।
तुम तो जन्मे त्रेता युग में
सत्य मार्ग पर सब चलते थे
कलियुग ने रंग दिखाया है
रामायण की मिट रही निशानी ।