माटी तो बोलती
अपने लाल को पुकारती
जो छोड़ गये माटी को
राह एक टक निहारती .
जिस माटी में जन्म लिये
पावन माटी कहलाती
अहो भाग्य देह एक दिन
उसी माटी में मिल जाती
माटी मेरी जननी
माटी सृजन करती
माटी तो बोलती
अपने लाल को पुकारती ।
माटी से ही मेरी हस्ती
माटी से ही मेरी शक्ति
माटी को चंदन सदृश
भूमि पुत्र भाल पर धारती
माटी का क़र्ज़
माटी का लाल ही उतारती
माटी तो बोलती
अपने लाल को पुकारती ।
माटी को पूर्वजों ने
बहुत स्नेह से सींचा
लहलहाती फसलों से
माटी भूख को मिटाती
जन्मभूमि की स्मृतियाँ
सदा जहन में बनी रहती
माटी तो बोलती
अपने लाल को पुकारती ।
माटी हमारी आन है
माटी हमारी शान है
माटी के सम्मान में
जान भी क़ुर्बान है
माटी से हमारी पहचान है
माटी की हम संतान हैं
माटी तो बोलती
अपने लाल को पुकारती ।
माटी बोलती संतान से
मुझे भूल मत जाना
आसमाँ को छू ले तू
पर धरा पर लौट आना
गोद मेरी सूनी कर
मेरे लाल चले मत जाना
माटी तो बोलती
अपने लाल को पुकारती ।