रामायण क्या है

“रामायण” क्या है?

रामायण क्या है?

रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं,

यह मनुष्य के भीतर छिपे

श्रेष्ठतम गुणों का आईना है।

यह वह दीप है

जो अंधकार में नहीं,

अहंकार में जलता है।

रामायण पढ़ने की नहीं,

जीने का महा ग्रंथ है।

यह बताता है कि

जीवन में भोग से नहीं,

त्याग से ऊँचाई मिलती है।

यहाँ अधिकार नहीं,

कर्तव्य बोलता है;

यहाँ स्वयं नहीं,

दूसरा पहले आता है।

यहाँ पति के लिए पत्नी त्याग करती है,

पत्नी के लिए पति नहीं

धर्म के लिए दोनों।

यहाँ भाई, भाई के लिए

सिंहासन छोड़ देता है।

यहाँ माँ अपने पुत्र को

राजा नहीं

सेवक बनते देखती है।

भगवान श्रीराम को

चौदह वर्ष का वनवास मिला।

न कोई प्रश्न,

न कोई प्रतिवाद।

और माता सीता जिनके चरणों में

राजमहल था

हँसकर कहती हैं,

“जहाँ आप, वहीं मेरा संसार।”

वन उनके लिए दंड नहीं,

सेवा का अवसर बन गया।

लक्ष्मणजो छाया की तरह

राम के पीछे चलते हैं।

राजसी सुख त्यागकर

वन की कठोरता को अपनाते हैं।

भरतजिन्हें राज्य मिला,

पर उन्होंने उसे पाँव की धूल समझा

नंदीग्राम को आश्रम बना लिया

और खड़ाऊँ को राजा मान लिया।

और शत्रुघ्नकहते हैं,

“जब मेरे भाई त्याग में हैं,

तो यह वैभव मेरे किस काम का?”

चारों भाई

प्रेम और त्याग के चार स्तंभ हैं।

उर्मिला

रामायण की वह नायिका

जो मौन में भी

इतिहास लिख देती है।

वह लक्ष्मण से कहती हैं

“मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं।

राम की सेवा ही तुम्हारा धर्म है।

मैं संग भी नहीं जाऊंगी

मेरे कारण तुम्हारे कर्तव्य में

बाधा न आए।”

चौदह वर्ष

बिना शिकायत, बिना आक्रोश,

बिना नींद केवल प्रतीक्षा।

यह त्याग दिखावा नहीं,

तपस्या है।

हनुमान जी समाचार लाते हैं

सीता जी हर ली गई हैं,

लक्ष्मण मूर्छित हैं।

माता कौशल्या कहती हैं

“राम से कहना,

लक्ष्मण के बिना अयोध्या न लौटें।”

माता सुमित्रा कहती हैं

“मेरे पुत्र राम-सेवा के लिए जन्मे हैं।”

और उर्मिला

जिनके पति युद्धभूमि में हैं

वह कहती हैं,

“मेरा दीपक बुझ नहीं सकता।

जो योगेश्वर राम की गोद में हो,

उसे काल भी छू नहीं सकता।

यह शक्ति लक्ष्मण को नहीं,

राम को लगी है

क्योंकि लक्ष्मण के रोम-रोम में

केवल राम हैं।”

यह रामायण है

जहाँ प्रेम त्याग बन जाता है,

और त्याग

ईश्वर तक पहुँचा देता है।

रामायण हमें सिखाती है

जीत शस्त्र से नहीं,

चरित्र से होती है।

राज सिंहासन से नहीं,

संस्कार से चलता है।

अगर कभी रामायण

सिर्फ़ पढ़ी नहीं,

समझी जाए,

तो आँखें नम होंगी

और मन झुक जाएगा।

रामायण पढ़िए

पर उससे भी पहले

रामायण जैसा बनने का साहस कीजिए।

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