रे मन क्यों बौराया इस जग में
भटक रहा तू इधर उधर !
नहीं रहता स्थिर एक समय
चलायमान सदा दिखता है
मृगतृष्णा में बहक गया है
अपने अस्तित्व को भूल गया
पुण्यों से मिलता मानव तन है
इसको तूने क्यों व्यर्थ किया
पहचानी राह न जाना किधर
तू भटक रहा है इधर उधर । रे मन
सेवा, परोपकार, दया,करुणा
मानव तन का यही धर्म हुआ
सत्कर्मों का पुण्य फल ही तो
अंत तक साथ निभाता है
देर न कर अब तू स्थिर हो जा
प्रभु के श्री चरणों में ध्यान लगा
बसा लें हृदय में तू प्रभु को
जीवन तेरा जायेगा सुधर । रे मन ..