मेरे शिव जी

मेरे शिव जी मेरे हृदय विराजे

क्यों दर दर भटकूँ मैं गलियों में ..

मेरे मन मन्दिर में एक शिवाला

हर क्षण दर्शन पाऊँ मैं

शिव जी मेरे हृदय विराजे

क्यों भटकूँ मैं गलियों में

मन कर्म और वाणी से

शुद्ध अंतःकरण है मेरा

मेरे रोम रोम में शिव विराजे

क्यों दर दर भटकूँ मैं गलियों में

बारहों ज्यातिर्लिंग हृदय में बसते

मेरे प्रभु तो हैं सर्वव्यापी

घट घट में वास है मेरे शिव का

मन क्यों भागे भटकन में

अगम अगोचर इन्द्रियों से जो परे है

वह हैं भक्त वत्सल शिव जी

शिव नाम ही है कितना पावन

क्यों दर दर भटकूँ मैं गलियों में

क्यों मैं भटकूँ तीर्थ तीर्थ

क्यों मैं जाऊँ अयोध्या काशी

सब तीर्थ जब मन के भीतर

क्यों भटकूँ मैं गलियों में

भक्तों के एक पुकार पर ही

दौड़े आते हैं मेरे शिव जी

अन्तर्मन से प्रभु को पुकारूँ

क्यों दर दर भटकूँ मैं गलियों में ।

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