हे प्रभु! देख ज़माने की ये हालत,
मेरा मन रोता है।
हर मासूम की आहों में,
मेरा मन रोता है॥
सड़क किनारे भूखा बच्चा
ठंड में सिसकता जाए,
तन पर चिथड़े, आँखों में डर,
नींद कहाँ वह पाए।
है तो वह भी लाल किसी का,
दर्द अकेले ढोता है,
हे प्रभु! देख ज़माने की ये हालत,
मेरा मन रोता है॥
कंधों पर बोझ मज़दूरी का
हाथों में कलम नहीं,
सपनों पर धूल जमी भारी,
आँखों में कोई चमक नहीं,
डंडे की चोटें पूछ रही हैं,
भविष्य क्या वह पाता है?
हे प्रभु! देख ज़माने की ये हालत,
मेरा मन रोता है॥
माँ–बाप से बिछुड़ी बच्ची
किससे आँचल माँगे?
हवस का शिकार बनी जब,
न्याय कहाँ वह ढूँढे?
रो-रोकर किसे पुकारे वह
भाग्य ही उसको तोड़ता है,
इतनी पीड़ा देख हृदय से,
मेरा मन रोता है॥
कूड़े के ढेर में नवजात,
साँसें भी थरथराईं,
माँ ने त्याग दिया ममता को,
मानवता शर्माई
कहाँ गया वात्सल्य जग का?
कहाँ करुणा सोती है?
इतना गिरता इंसान देख कर,
मेरा मन रोता है॥
हे प्रभु! देख ज़माने की ये हालत,
मेरा मन रोता है।