ईश्वर परम चेतना सागर, अनंत प्रकाश अपार,
जिससे सृष्टि सजीव हुई, जग में फैला प्यार।
जीव उसी का अंश है, चेतन उसका रूप,
पर सीमित उसकी दृष्टि है, जीवन का बस रूप।
ईश्वर सबमें व्याप्त हैं, साक्षी सब घटनाक्रम के,
जीव बँधा शरीर में, बंधन उसके कर्म के।
दो प्रकृतियाँ वर्णित हुईं, एक अचेतन स्थूल,
दूसरी चेतन जीव है, यह गीता का मूल।
जीव चेतन पर सीमित है, प्रभु चेतन परम महान,
एक जानता देह मात्र, एक जानें ब्रह्म विधान।
भूल भ्रम में जीव फँसता, पाप-पुण्य में डोल,
जनम-जनम के चक्र में, खोजे निज अंजोल।
जब जाने “मैं वही अंश हूँ”, प्रभु मुझमें ही निहित,
तब मिट जाएँ भ्रम तमस के, हो आत्मा पुनः प्रकाशित।
हरि ऊँ हरि ऊँ
सतचिदानंद स्वरूप प्रभो, दो मुक्ति का वरदान।