भजन विधि का विधान

भजन : विधि का विधान

विधि विधान है सबसे ऊँचा,ईश्वर भी बँधा विधान में।विधाता की है लीला निराली,खेल रचाता विधान में॥

हरि ओम् तत्सत् हरि ओम् तत्सत्॥

महामृत्युंजय जिनका अंकर, महाकाल कहलाते शंकर।

फिर भी सती को रोक न पाए,दग्ध हुईं यज्ञाग्नि के भीतर॥

हरि ओम् तत्सत् हरि ओम् तत्सत्॥

श्रीराम चले वनगमन को, भरत हुए व्यथित बेहाल।

वशिष्ठ मुनि बोले धीरे से विधि गति है, प्रबल है काल

हरि ओम् तत्सत् हरि ओम् तत्सत्॥

वन-वन फिरते सिया लखन संग,छोड़े अवध धन धाम।

घास-फूस की झोपड़ियों में, रात बिताते श्रीराम॥

हरि ओम् तत्सत् हरि ओम् तत्सत्॥

कृष्ण भी आहत हुए अंत में, झेला तीर बहेलिये का।

चुकाया ऋण त्रेता युग का,छिप कर प्राण लिया बाली का

हरि ओम् तत्सत् हरि ओम् तत्सत्॥

मानव तू क्यों इतराता है,तू तो कठपुतली मात्र है।

जब ईश्वर भी बँधे विधान में,तू तो शून्य, ब्रह्म का पात्र है॥

हरि ओम् तत्सत् हरि ओम् तत्सत्॥

विधि विधान है सबसे ऊँचा,ईश्वर भी बँधा विधान में।

विधाता की है लीला निराली,खेल रचाता विधान में॥

हरि ओम् तत्सत् हरि ओम् तत्सत्॥

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