एक ही सत्य तो है इस जग में
वह है केवल हरि का नाम,
रे मन ! तू क्यों है उदास
कर ले बंदे हरि गुणगान ।
मृगतृष्णा में कब तक भागे
कुछ न मिलता नियति के आगे,
यह जीवन है चार दिनों का
कर ले बंदे हरि गुण गान ।
चंचल मन को स्थिर कर ले
त्याग दें तू सब मोह पाश,
मन में रख तू हरि पर आस
कर ले बंदे हरि गुण गान ।
दूषित मन को तू निर्मल कर ले
कलुषित तत्वों का न हो स्थान,
जीव जीव में मेरे प्रभु विराजें
कर ले बंदे हरि गुण गान ।
नयनों में प्रभु की छवि मनोहर
स्थिर मन कर ले तू ध्यान
मत भटका मन इधर उधर तू
कर ले बंदे हरि गुण गान ।