कैसे भूलें माँ–बाप के उपकार को
माँ तो माँ ही होती है,
कैसे भूलें उसके उपकार को,
जिसके आँचल में सिमट जाता है
पूरा का पूरा संसार।
नौ महीने पीड़ा सहकर
जो जीवन को धरती पर ले आती है
कैसे भूलें उसके उपकार को।
रात–रात भर जागती है,
अपनी नींद कुर्बान कर देती है,
बच्चे की एक मुस्कान पर
अपने सारे दुख भुला देती है।
पालना–पोषण में बीत जाता है जीवन,
फिर भी होठों पर शिकन नहीं आती,
कैसे भूल जाए कोई उस माँ को
जिसकी ममता कभी थकना नहीं जानती
कैसे भूलें उसके उपकार को।
पिता भी तो कम नहीं होते,
मौन साधे रहकर सब सह जाते हैं।
माँ ने जन्म दिया तो
पिता ने उँगली पकड़ कर चलना सिखाया।
माँ ने गोद में सुलाया,
पिता ने कंधों पर बैठा कर दुनिया दिखाई।
माँ का प्यार शीतल छाया है,
तो पिता का स्नेह वटवृक्ष की छाया।
माँ ने आँसू पोंछे,
तो पिता ने अपने आँसू छिपाकर
हौसला बढ़ाया।
डाँट में भी शिक्षा थी,
कठोर शब्दों में भविष्य का सपना।
अपने अरमानों को पीछे रख
उन्होंने हमारे सपनों को पंख दिए,
खुद भीतर–भीतर टूटते रहे
पर हमें कभी कमजोर न होने दिए
कैसे भूलें माँ–बाप के उपकार को।
धन्य हैं श्रवण कुमार के माता–पिता,
जिन्हें श्रवण ने कंधों पर उठाया।
धन्य हैं राजा दशरथ,
जिनके एक वचन पर राम वन को चल पड़े।
धन्य हैं ऋषि जमदग्नि,
जिनके आदेश पर परशुराम ने
धर्म की कठिन परीक्षा दी
और मातृ–वंदना को अमर कर दिया।
धन्य हैं ययाति,
जिनके लिए पुत्र पुरु ने
अपनी युवावस्था अर्पित कर दी।
धन्य हैं शान्तनु,
जिनके लिए भीष्म ने
आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा ली।
धन्य हैं वे सभी माता–पिता,
जो अपने बच्चों के हृदय में पूजित हैं।
कैसे भूलें माँ–पिता के उपकारों को
जो ईश्वर का रूप धर कर आए।
जिनके चरणों में ही सच में
स्वर्ग के सारे सुख समाए।
माँ की ममता, पिता का त्याग
जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।
जब तक साँसें चलती रहें,
उनकी सेवा ही हमारी सच्ची भक्ति है।