जब मैं नहीं रहता, तू दिखता रे,
जब मन मौन हो, तू झलकता रे।
ना रूप तेरा, ना कोई साया,
फिर भी हर सांस में तू धड़के रे॥
ढूँढा तुझको जग के कोनों में
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में,
पर पाया जब भीतर झाँका,
तू ही था मेरी धड़कनों में।
कण-कण में तेरी आभा छाई,
हर कण बोले “तू ही तू” कहके रे॥
जब मैं नहीं रहता, तू दिखता रे,
जब मन मौन हो, तू झलकता रे॥
विचार थमें, तो तू मुस्काए,
मौन गगन में स्वर छा जाए।
‘मैं’ का दीप जो बुझ गया रे,
तेरा प्रकाश जगमगाए।
अहं का पर्दा हटे जो पलभर,
हर दिशा में तू झर-झर बहके रे॥
जब मैं नहीं रहता, तू दिखता रे,
जब मन मौन हो, तू झलकता रे॥
ना नाम तेरा, ना कोई भाषा
फिर भी हर शब्द तेरा आशा,
ना कोई आकार तुम्हारा,
फिर भी तू साकार हमारा।
जिसने खुद को खो दिया रे,
उसने तुझको पा लिया रे॥
जहाँ शून्य है, वहीं तू पूरा,
जहाँ मौन है, वहीं नूरा
मैं मिट जाऊँ, तू बस जाए,
हर अंश तुझमें मिलके रे॥
जब मैं नहीं रहता, तू दिखता रे,
जब मन मौन हो, तू झलकता रे॥