विनाश के पथ पर चलते हम, दोष देते दैव को
अभी तो झाँकी भर देखी, काट रहे हरित वन को ।
धरती का दोहन करते हम, पर्वत नदियाँ छोड़ कहाँ
लोभ अंधेरा बढ़ता जाए, बुझते जीवन के दीये यहाँ
विनाश के पथ पर चलते हम, दोष देते दैव को ।।
सागर का क्रोध उमड़ता अब, तटों को तोड़ बहाता है
पिघल रहे हिम शिखर दूर के, ताप नया संकट लाता है
फिर भी अपनी दौड़ में अंधे, कौन चेतना जगाता है
विनाश के पथ पर चलते हम, दोष देते दैव को ।।
नदियों का जल हुआ विषैला, श्वास चुराती धूल भरी
आकाश की नीली चादर पर, फैल रही धुंध गहरी
फिर भी सुविधा की चाहत में, मनुष्य बना रहा पहरी
विनाश के पथ पर चलते हम, दोष देते दैव को ।।
परिवर्तन की घड़ी अभी भी, हाथों में हमारी है
आशा के दीप जलाएँ फिर, हरियाली की क्यारी है
मिलकर संकल्प करें सब, धरती माँ को सँवारी है
रोकें विनाश का यह रथ, दोष न दें अब दैव को ।।