भीष्म तीर शैय्या पर थे सोये नियति से लाचार
शब्द न निकले होंठ से, अन्तर्मन से हुई पुकार
हे कृष्ण!! बताओ आप ही, समझो मेरी पीड़ा,
क्यों ऐसा जीवन दिया जीवन भर रहा लाचार ।
युद्ध लड़ता था अपने आप से, दोनों थे मेरे रक्त,
कैसे मारता मैं किसी को, कितना था मैं संतप्त
आप तो साक्षात जगदी़श्वर हैं क्यों हुआ ये युद्ध ?
रोक सकते थे आप तो यदि जग भी होता विरुद्ध ।
ऐसा जीवन क्यों मिला, किस जन्म का था पाप
जीवन पर्यंत मैं रोता रहा, मन में था पाले संताप
पितृ वचन से था मैं बँधा, मूक देख रहा अन्याय
दुर्योधन के कटु वचन, सुन हो जाता था मृतपाय।
धर्म-अधर्म के युद्ध में, मैं खड़ा रहा केवल मौन
ये कैसी मेरी विवशता, पूँछ न सका तू कौन?
ऐसा जीवन प्रभु क्यों दिया, क्या रहा मेरा दोष
देखो प्राण भी न त्याग सकूं कैसा नछत्र का प्रदोष।
कृष्ण बोले - हे पितामह यही विधि का विधान
कर्मों का फल सब भोगते नहीं बचा कोई इंसान
जो अधर्म के संग खड़ा रहा, पाया उसने अपमान
सत्य शाश्वत दीप रूप जलता हर युग, हर स्थान।
अधर्म को आप देखते रहे, मौन का पहने चोला
मौन धर्म से बड़ा नहीं, क्यों नहीं वचन को तोला,
जग आपको क्या कहे धीरव्रती और युद्धवीर,
या मौन रूपी कायरता का, पहने रहे आप चीर॥
कभी शब्द से जग जीता, कभी मौन से मन हारा,
जो समझे दोनों का रहस्य, वही सच्चा साधनधारा।
मौन और शब्द दो पंख हैं, उड़ान इन्हीं से जीवन की,
एक देता दिशा विवेक की, दूसरा शक्ति जीवन की॥