ऐ जिंदगी जरा ठहर जा रे

ऐ ज़िंदगी, ज़रा ठहर जा रे,

काहे भागे अंधी चाल।

मन का दीपक काँप रहा है,

तेल न बचा, बाती ढाल॥

तन तो चलता हाट-बाज़ार,

मन बैठा सूने घाट।

भीतर शोर, बाहर सन्नाटा,

कौन सुने मन की बात॥

मैं तो बँधा तेरी डोरी में,

तू ही मेरी साँस।

तू बिन सूना देह-नगरिया,

टूटे हर विश्वास॥

तन पर बोझ न दिखे ज़्यादा,

मन पर पहाड़ समान।

हँसत-हँसत थक जाता जीव,

कहाँ छुपाऊँ जान॥

गुरु बिना सब राह अँधेरी,

नाम बिना संसार।

दो पल रुक कर नाम सुमिर ले,

उतर जाए भार॥

छूटे माया, टूटे फंदा,

जब मन ले विश्राम।

ठहर गई जब चाल ज़रा-सी,

मिल गया भीतर राम॥

ऐ ज़िंदगी, ज़रा ठहर जा रे,

ठहर में ही पहचान।

जो थम गया, वही पहुँचा रे,

उमानाथ रहे बस भान॥

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