कुम्हार मिट्टी गूँथता है
सुन्दर सुन्दर खिलौने बनाता है
वह खिलौना एक दिन टूट जाता है
और मिट्टी में मिल जाता है
कुम्हार वही मिट्टी पुनः गूँथता है
और फिर नये खिलौने बनाता है
यही तो जीवन चक्र है .
शिशु जन्म लेता है
कुछ वर्षों में वह किशोर बनता है,
वृद्ध होता है और उसका
एक दिन अंत हो जाता है,
वह पुनः शिशु बनता है
यही क्रम सतत चलता रहता है
यही तो जीवन चक्र है .
वृक्ष में कोमल पत्ते आते हैं,
समय बीतने पर वे पत्ते
कठोर बन जाते हैं, सूख जाते हैं
और एक दिन गिरकर धरती पर आ जाते हैं
समय पाकर वृक्ष पर
पुनः नये नये कपोल आते हैं
यही तो जीवन चक्र है
पूरी ईश्वरीय सृष्टि ही
चक्र में व्याप्त है
जिसका सृजन है
उसका एक दिन अंत भी है
जिसका अंत है
उसका पुनर्सृजन भी है
यही तो जीवन चक्र है ।