छोड़ दो वो स्थान

छोड़ दो वह स्थान,

जहाँ मान न हो, जहाँ आँसू बहें ।

बुलावा नहीं चाहिए वहाँ,

जहाँ प्रेम और आत्मिक भाव रहे,

मन स्वयं पहुँच जाता है वहाँ,

जहाँ प्रेम की गंगा बहे।

जहाँ लगाव नहीं, बिलगाव रहे

वहाँ ठहरना व्यर्थ है

छोड़ दो वह स्थान,

जहाँ मान न हो, जहाँ आँसू बहें ।

जहाँ अपमान और तिरस्कार हो,

वहाँ सम्मान की राह न रहे,

श्रीकृष्ण ने भी यही दिखाया,

विदुर की ही बाँह गहे।

रिश्ते केवल खून से नहीं,

भावों से जुड़ते हैं सच्चे,

जहाँ आँखों से आँसू गिरते हों,

वहाँ टिकना उचित नही

छोड़ दो वह स्थान,

जहाँ मान न हो, जहाँ आँसू बहें ।

कटु वचन, छल और अहंकार,

नाशक हैं, पालक नहीं,

त्याग दिया विभीषण ने रावण को,

शरण ली प्रभु श्रीराम की।

सच्चा प्रेम अमर होता है,

आत्मा से आत्मा तक पहुँचता है,

जहाँ पवित्र प्रेम की गंगा बहे,

वहीं स्वयं ईश्वर वास करता है

छोड़ दो वह स्थान,

जहाँ मान न हो, जहाँ आँसू बहें ।

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