है पावन संगम की धरती,
ये प्रयागराज है।
आस्था, श्रद्धा, संस्कारों की बेनी
ये प्रयागराज है॥ 2
गंगा–यमुना–सरस्वती,
आकर यहीं समाएँ,
अमृत-सा पावन जल लेकर,
सबको जीवन पिलाएँ।
दूर–दूर से आते भक्त,
डुबकी लगा तर जाएँ,
साँझ आरती की ज्योति में,
माँ गंगा मुसकाएँ।
श्रद्धा, प्रेम, विश्वास का,
यह अनुपम अंदाज़ है
है पावन संगम की धरती,
ये प्रयागराज है॥
ऋषि–मुनियों की तपोभूमि,
ज्ञान की ज्योति जले,
भारद्वाज आश्रम पावन,
इतिहास यहाँ फले।
जहाँ श्रीराम पधारे थे,
धन्य हुई हर डगर,
कण–कण में बस राम यहाँ,
भक्ति बहाए सर।
राम–नाम की गूंज लिए,
हर कण में आवाज़ है
है पावन संगम की धरती,
ये प्रयागराज है॥
साधु–संतों का डेरा लगे,
माघ स्नान का मेला,
महाकुंभ की दिव्य छटा में,
जग हो जाए अलबेला।
देश–विदेश से आए जन,
एक सूत्र में जुड़ जाएँ,
भेद–भाव सब छोड़ यहाँ,
मानवता को अपनाएँ।
विश्व पटल पर गूंज उठी,
इसकी ही पहचान है
है पावन संगम की धरती,
ये प्रयागराज है॥