चलो लौट चलें बचपन की गलियों में

चलो लौट चलें, बचपन की गलियों में,

जहाँ हर मोड़ पे खुशबू थी प्यारी।

जहाँ मिट्टी भी गीत सुनाती थी,

हर साँस थी जैसे त्योहार की तैयारी।

चलो लौट चलें बचपन की गलियों में।

जहाँ मन न थकता, न रुकता था,

जहाँ हर सपना सच लगता था।

जहाँ दोस्ती थी चाँद सी निर्मल,

जहाँ झगड़े भी पल में मिटता था।

सुनहरी धूप में साइकिल उड़ती,

हवा संग दौड़ लगाते थे।

जंगली फूलों की पंखुरियाँ तोड़,

माँ के आँचल में लाते थे।

खट्टे-मीठे आमों का मौसम,

गुड़-जलेबी की थी मिठास,

हर लम्हा जैसे ठहर गया हो,

वक़्त भी रुक जाता उस आस।

वो बारिश, वो कागज़ की नावें,

वो पानी में सपनों की छाँवें।

वो कूदना, गिरना, फिर हँसना

वो पल आज भी मन को भाएँ।

चलो लौट चलें, बचपन की गलियों में,

जहाँ हँसी थी बेफिक्र हवाओं में।

जहाँ मन अभी भी दौड़ लगाता है,

उन बीते सुनहरे सालों में।

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