टूटा जब वह फूल डाली से
स्वयम् के दुर्भाग्य को कोसा,
कहाँ होगा अब वतन उसका
न जाने अब आगे क्या होगा ।
अभी तक गुले गुलज़ार रहता था,
चमकता था, महकता था,
धूमिल हो गयी सब चमक उसकी,
न जाने अब आगे क्या होगा ।
अर्पित हो जाता वह प्रभु को
जीवन धन्य उसका होता,
नियति में लिखा क्या है,
न जाने अब आगे क्या होगा ।
डालों से जुड़ा रहा जब तक
जीवन कितना सुखमय था,
झटके में वह बिखर गया
न जाने अब आगे क्या होगा ।
जीवन ऐसा ही तो होता है
डाल से एक दिन टूटना पड़ता है,
मन में यही विचार कौंधता है
न जाने अब आगे क्या होगा ।