लोकगीत गांव की रात गांव की भोर

लोकगीत · “गाँव की रात, गाँव की भोर” ✍️

गाँव की रात बड़ी प्यारी ओ रामा ×2

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा ×2

मिट्टी की खुशबू, मन में सुकून,

यही धरती जग से प्यारी

गाँव की रात बड़ी प्यारी

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा ×2

पूर्णिमा की चाँदनी छाई,

मेले सजे तमाम,

दूर कहीं नौटंकी बाजे

हीर-किस्सों की शाम,

झूम नचनिया ताल मिलाये

वाह वाह हुंकारी,

गाँव की रात बड़ी प्यारी

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा

तीन बजे कुत्तन भौंके,

जागा पूरा गाँव,

दो रोटी का फ़र्ज़ निभावे,

डटके ड्यूटी करते ठांव ..

सियारन का रुदन उठे,

करते हुवाँ-हुवाँ सारी,

लगे मिलकर चोट लगावे,

जैसे बाजे नगाड़ा भारी

गाँव की रात बड़ी प्यारी

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा ×2

मुर्गा बाँग लगावे भोर में,

चिड़ियाँ बोले संग संग,

“जाग रे जग के लोग सभी,

रैन बीत गयी सारी .

गौ माता खूँटे पर रंभावे

बाछा माँगे बारी-बारी

गाँव की रात बड़ी प्यारी

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा ×2

सूरज झाँके खेत किनारे,

दूध-सा चमके पानी,

बगुले पाँति जमाकर बैठे,

कीड़ों पर साधें निशानी

ताल किनारे पंछी गावत,

मोर नृत्य करत मनोहारी

गाँव की रात बड़ी प्यारी

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा ×2

आटा गूँधे चूल्हा जल लए,

अम्मा रोटियाँ सेंके,

बाबूजी खाट पे बैठे,

हुक्का गुड़गुड़ गुड़गुड़ फूँके

नन्हा भइया स्कूल को जाए,

पीठ पे झोला भारी

गाँव की रात बड़ी प्यारी

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा ×2

हल जोते किसान सुबहे से

धान कटोरा लहरावे,

घरवाली सब्ज़ी रोटी लावे

प्यार से बैठ जेवावे

बगिया में तुलसी सुहागन,

देवे खुशबू मनवारी

गाँव की रात बड़ी प्यारी

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा ×2

शहर में क्या रखा है भैया,

हंगामा शोर बहुत भारी

गाँव की गोद में बैठ के मिलती,

शुद्ध जलवायु सुखकारी

जीवन पूरा यहीं बसता,

मन होता हल्का-भारी

गाँव की रात बड़ी प्यारी

गाँव की भोर बड़ी न्यारी ओ रामा ×2

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