शरण तुम्हारी ले लूँ नंद लाला, दिखता न कोई उपाय।
नाम तेरा जब मुख पे आए, सकल संकट मिट जाए॥
हे नाथ नारायण वासुदेवा (२ )
सभा भरी थी मौन पड़ी थी, नयनों में जलधार,
पाँचों पांडव मौन हुए थे, टूटी द्रौपदी की हर इक आस।
भूले सब निज धर्म को, रुकी पड़ी थी साँस,
तब अधरों से पुकार उठी
“हे नाथ अब आओ मेरे पास।”
भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र सब, झुकाए मस्तक आज,
कोई न बोला, कोई न टोका, मौन कौरवी दरबार।
देख प्रभु ने द्वारका में, अश्रु भरे संसार,
“अब मैं जाऊँ अपनी भक्तन के,
लाज बचाऊँ बारंबार।”
रूक्मिणी ने पूछा हँसकर, “प्रभु व्याकुल क्यों हो आज?”
कृष्ण कहे “मेरी भक्त द्रौपदी पर आया है अपराज।”
पर जब तक वो नाम न लेगी,
मैं न तोड़ूँ निज संस्कार,
पुकार सुनी तो दौड़ा मैं,
हरि बन संकटहार।
साड़ी बढ़ी, लाज बँची, काँपे सब अधम प्राण,
धर्म उठा, अधर्म झुका, गूंजा कृष्ण कृष्ण का नाम।
भक्त पुकारे जो सच्चे मन से,
टूटे बंधन जाल,
द्रौपदी की भक्ति सिखाती
प्रेम है परम कवच महान।
फाड़ा था जो पल्लू उसने, प्रभु की उंगली बाँध,
आज वही ऋण चुकाने आए, बनकर दीनदयाल।
कहते प्रभु “भक्त का ऋण मैं,
रख नहीं सकता भार,”
भक्ति जहाँ नारी सी पावन,
वहाँ ही श्री हरि अवतार!”