तीन पहर भजन

रे मन ! तीन पहर तो बीत गये

कब आये कब निकल गये

समय पंख लगाकर उड़े

बहुमूल्य क्षण फिसल गये ॥रे मन

चौथा पहर जब आ गया भाई

मन में यह अहसास भये

घर गृहस्थी के भँवर जाल में

समय व्यर्थ सब गये ॥ रे मन

तर्क वितर्क में फँसे रहे अज्ञानी

निर्थक जीवन सब जिये

धर्म कर्म कुछ कभी नहि कीन्हे

प्रभु का स्मरण न किये ॥ रे मन

दीन दुखियों की सेवा न कीन्हे

जीवन भर पाप कर्म किये

परोपकार की राह न पकड़े

सत्संगति से दूर रहे ॥ रे मन

पाखंड झूठ पर सदा बल दीन्हे

सत्य का मार्ग न चुने

तुच्छ काया को सदा सँवारे

मानव जीवन सफल न किये ॥ रे मन

जो कुछ साँसें शेष है बन्दे

कुछ तो अब यत्न करें

मन मन्दिर में सदा प्रभु विराजे

सार्थक जीवन करे ॥ रे मन

रे मन ! यह दुनिया है रैन बसेरा

इसमें बना न तू स्थायी डेरा

यम की घंटी कब बज जाये

हाथ मलता ही न रहे ॥रे मन

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