कवि चला गाँव की ओर अवधी

कवि बहुत रहे हो शहरन मा,

चलऽ अब गाँव कइ ओर।

सुघ्घर हवा, मीठ जल पावऽ,

सुख मिलइ हर इक ठौर॥

कटि गवा गन्ना खेतन मा,

ट्रैक्टर ऊपर लदाय।

फैक्ट्री कइ राहे चलि दीन्ह,

मीठे सपना सजाय॥

गेहूँ हँसइ हरियर-हरियर,

बाली आवइ तैयार।

सरसों ओढ़े पीयर चुनरिया,

खेतन लागे त्यौहार॥

अरहर बोले हमहूँ हईं,

पीछे काहे रह जाय।

दानन भरी बाली लहराय,

गाँव कइ शान बढ़ाय॥

मटर बोले ठहर जरा,

अबहीं बचपन बाटे।

समय आय तब देखिहौ,

हमहूँ रंग साटै ॥

आलू बोले माटी फाड़ि,

बाहर अब आ गइन।

पूरा पक्के हईं हम सब,

बाजार चला जायिन॥

बथुआ बोले मत बिसरिहौ,

सेहत कइ हम सार।

मटर बीच हम छिपे हईं,

थारी स्वाद अपार॥

गाजर, मूली, मिर्च, धनिया,

धीरे-धीरे हँसि बोलें।

हम बिन सूनी रसोई,

स्वाद कहाँ से घोलें॥

चना रहा चुपके से बैठा,

अचानक बोला चिल्लाय।

हमइ छोड़ि कइ कहाँ चले,

बहुत मंहगे हम भाय॥

खेतन-खेतन हरियाली,

मेड़न पर नाचत मोर।

प्रकृति कइ ई सुन्दरता,

शहरी ईंट-गारा न ठौर॥

कवि बहुत रहे हो शहरन मा,

चलऽ अब गाँव कइ ओर।

धरती मइया गोदी खोले,

सुख मिलइ हर इक ठौर॥

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