हरि भजन

हरि नाम सुमिरो मन रे .. मन रे.. मन रे .. मन रे

ऊँ हरि हरि हरि हरि

तू क्यों आया इस जग में

बिसरा क्यों दिया मन रे

छोड़ सत्कर्म पाप चढ़ाया

क्यूँ तू नहीं डरता मन रे ।

ऊँ हरि हरि हरि हरि

पगला तू गया मृगतृष्णा में,

भव-बन्धन में क्यों फँसा मन रे

क्षण भर का खेला है जीवन,

क्यूँ भूल गया तू हरि रे।

ऊँ हरि हरि हरि हरि

बाह्य रूप क्षणभंगुर है,

कब बजे यम की घंटी रे

हरि नाम ही जीवन आधार,

क्यूँ न भजे इसे मन रे।

ऊँ हरि हरि हरि हरि

हर शब्द में हरि का वास रहे,

हर पल भज तू हरि रे

तेरी लेखनी हरि नाम लिखे,

हर शब्द बोले केवल हरि रे।

ऊँ हरि हरि हरि हरि

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