प्रेम का प्याला पी ले प्राणी, हरि रस अमृत धार।
मीरा जैसी प्रीत जगा ले, साँवरिया हो आधार॥
प्रेम का प्याला पीकर मीरा, अमृत रस का पान किया,
डगर-डगर साँवरिया ढूँढे, साधु-संत संग डेरा डाल लिया।
राजमहल का वैभव छोड़ा, वैरागी का भेष धरा,
मंदिर-मंदिर तप करती मीरा, गिरधर को पति माना॥
ग़मों का प्याला पीती रही, कृष्ण-प्रेम को गटक लिया,
राणा भेजे विष को हँसकर, मीरा ने वह पान किया।
प्रेम-सिंधु में डूबने वाला, भय को कभी न जान,
तन-मन की सुध-बुध खो बैठी, सब कुछ प्रियतम पर वार॥
बजी साँवरिया की बाँसुरियाँ, भक्ति में जीवन ढाल लिया,
प्रेम ही शक्ति, प्रेम ही भक्ति, जग को मीरा ने जता दिया।
कृष्ण-प्रेम बिन जग है सूना, प्रेम में सृष्टि समाई,
जिसने पी लिया प्रेम-रस, उसकी नैया पार लगाई॥