रे मन मत हो उदास

रे मन ! तू क्यों है उदास

छोड़ मत जीने की आस,

कुछ हंस ले, कुछ बोल ले,

हंसने का शुल्क नहीं लगता है । रे मन मत ..

सुबह से मुँह लपेटे पड़ा है तू

जैसे बेहोशी छाई है,

किस बात का ग़म है तेरे जहन,

अवसाद में घिरा तू रहता है ।रे मन ..

नीले गगन को तू तकता है

मन ही मन कुछ गुनता है,

किसकी यादें कचोटती हैं

जो मन उद्वेलित करती हैं । रे मन

सब मस्त हैं अपने अपनों में,

अपने तक ही तो सीमित हैं,

तू किस बात की चिंता करता है

मृगतृष्णा में क्यों जीता है । रे मन

क्या यही ज़िन्दगी होती है

ज़िन्दगी तो जीने का नाम है,

रख हौसला क़ायम अपने मन में,

बहुमूल्य क्षण व्यर्थ में खोता है । रे मन

हर्ष विषाद दोनों में तू एक जैसे है

सदा समभाव तू रहता है,

सुख कहाँ है तेरे जीवन में

तू भ्रम में ज़िन्दगी जीता हैं । रे मन ..

संसार तो यह ख़ुशियों से भरा हुआ,

ज़रूरत है सोच बदलने की,

चल उठ अब चल मुसाफ़िर

फूलों की महक क्यों नहीं सूंघता है। रे मन

चार दिनों का तू राही है

बटोर ले सारे जहां की ख़ुशियाँ झोली में,

कर मन प्रफुल्लित, मत हो उदास,

नाहक तू चिंता करता है । रे मन

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