खोजूँ कहाँ मैं पाऊँ कहाँ पर
नहीं पता मैं जाऊँ कहाँ पर
कोई कहे मथुरा कोई कहे काशी
कोई कहे प्रभु मेरे हैं अविनाशी ।
कोई ढूँढता है प्रकृति में
कोई संगीत में पाता है
कोई ढूँढता मन मन्दिर में
प्रभु दर्शन के सब अभिलाषी ।
प्रभु तो है सर्वत्र समाना
वेद पुराण कहे यही जाना
प्रभु तो हैं घट घट के वासी
क्यों जाऊँ मैं मथुरा काशी ।
प्रेम भाव के प्रभु भूखे हैं
प्रेम से वे प्रकट होते हैं
प्रेम तत्व है जिनके भीतर
हृदय स्थल में मथुरा काशी ।
कर्म, ज्ञान और भक्ति
तीन सूत्र है ईश्वर दर्शन के
भक्ति तो सब पर है भारी
माया भी हो जाती दासी ।