हे माँ शारदे !! वाणी दो ऐसी,
हर शब्द बने मधुर सरगम।
मन की वीणा झंकार उठे,
हर सुर में गूँजे तेरा नाम॥
ना मैं कवि, न कोई ज्ञानी,
बस शब्दों का इक सेवक हूँ
जो कुछ लिखूँ, वही तेरा वर,
तेरे चरणों का अर्पण हूँ॥
कलम न झुके अहंकार तले,
हर अक्षर गाए तेरा धाम।
भाव रहें निर्मल, शुद्ध सदा,
भरे हृदय में तेरा नाम॥
हर पंक्ति में तेरा ही स्पंदन,
हर छंद में तेरा ही गान।
हे माँ वाणी! तू ही प्रेरणा,
तू ही कवि का सच्चा प्राण॥
नमन तुझे हे शारदा माते,
नमन तुझी को हर अरमान।
तेरी कृपा से पावन होये,
शब्द, कला और यह प्राण॥