कुछ कर ले भाई, सोता न रह,
ज़िम्मेदारी तेरे सिर पर है।
समय था लिखने-पढ़ने का,
भाग रहा था इधर-उधर।
ज़िम्मेदारी पढ़ाई में न समझी,
लाता था केवल सिफ़र।
ज़िम्मेदारी आयी कमाने की,
आलस्य में पड़ा सोता है।
बिना परिश्रम के कुछ नहीं मिलता,
कर्म करना पड़ता है।
पड़ा-पड़ा घर में सोता है,
भाग्य को अपने कोस रहा।
कर्म बदलता है भाग्य को,
इसे क्यों तू नहीं समझ रहा?
इंटर, बीए क्या कर डाला,
जैसे पीएचडी पूरी कर ली।
नक़ल करके डिग्री ले ली,
सरकार की कमी निकाल रहा।
निर्थक है तेरी यह डिग्री,
फेंक दे इसे कूड़ेदान में।
भूल जा तू पढ़ा हुआ कुछ,
निरक्षर स्वयं को समझ ले।
खड़ा हो जा सुबह-सुबह चौराहों पर,
देख मज़दूरों की लंबी क़तार।
वे भी ईश्वर के बंदे हैं,
अपने भाग्य को नहीं कोसते।
शिकायत किसी से नहीं करते,
श्रम की रोटी खाते हैं।
कुछ कमा कर घर वापस आते हैं,
अपना परिवार चलाते हैं।
करते-करते, घिसते-घिसते,
कोई राजगीर बन जाता है।
कोई पलंबर बन जाता है,
कोई नक्काशी करता है।
कोई बढ़ जाता है इसके आगे,
लिखे-पढ़े को पाठ पढ़ाता है।
देखे हैं मैंने कितनों को,
अपने हुनर से नाम कमाया है।
कौन सी टेक्निकल डिग्री है धारक?
पर हाँ, हुनर है उनके पास।
जो एक दिन में नहीं सीखा,
काम करते-करते सीखा है।
काम कोई छोटा-बड़ा नहीं होता,
कोई सीधे अन्तिम सीढ़ी नहीं पहुंचता।
हर पायदान पर पग रखना पड़ता है,
तब वह अन्तिम पायदान पाता है।
सोच अपनी ऊँची रख,
परिश्रम से ही निकलती हैं राहें।
ले जाती हैं समृद्धि और उत्थान की ओर,
फैलाए ख़ुशियों की बाँहें।
कुछ कर ले भाई, सोता न रह,
ज़िम्मेदारी तेरे सर पर है।