ऐ दर्पण तू ऐसा दिखलाये
जो तुझ जैसा दिख जाये
झांकती रहूँ उसके भीतर मैं
नयन मेरे क्यों न थक जाये ।
एक ललक ऐसे दर्पण की
जो मेरे हृदय को छू जाये
दे दे दिल के द्वार पर दस्तक
मन के दर्पण में वो छा जाये ।
कैसा होता मन का दर्पण
पता नहीं क्या क्या सोचता है
खोये सपने ख़्वाब सुहाने
मधुर मधुर वो गीत सुनाये ।
बिखर गये जो मन के सपने
वो उसको जीवंत कर जाये
दर्पण कोई ऐसा मिल जाये
जो मेरा प्रियतम बन जाये ।