ऊधव मन में ज्ञान लिये, मथुरा से ब्रज आये,
योग-वियोग की बात कहें, गोपिन को समझाये।
गोपिन बोलीं “ऊधव! पहले बदलो अपनी दृष्टि,
जहाँ प्रेम है वही नारायण, वहीं बसती है शक्ति।”
गोपिन बोलीं “कहो ऊधव! कैसा योग सिखाओगे?
जिस मन में बस श्याम हमारे, उसे कहाँ ले जाओगे?
नयनों में नंदलाल बसे हैं, श्वास-श्वास में सृष्टि
प्रेम ही शक्ति, प्रेम ही भक्ति, प्रेम से ही सृष्टि।”
कहते हो निर्गुण का ध्यान, हमको यह न भावे,
हम तो साँवरे सूरत बिन, एक पल भी न रह पावें।
राधा-नाम जपे तो जागे, विरह-दीप की वृष्टि
प्रेम ही शक्ति, प्रेम ही भक्ति, प्रेम से ही सृष्टि।
ऊधव चकित, वचन रुक गये, ज्ञान हुआ सब मौन,
देख विरह की अग्नि प्रखर, पिघला अंतर-कोन।
झुककर बोले “धन्य ब्रज-नारी! धन्य तुम्हारी सृष्टि
प्रेम ही शक्ति, प्रेम ही भक्ति, प्रेम से ही सृष्टि।”
राधे-कृष्णमय हो गया, ऊधव का भी प्राण,
ज्ञान-गर्व सब तज दिया, पाया प्रेम-निधान।
भागवत का यह मर्म है, यही भक्ति की दृष्टि
प्रेम ही शक्ति, प्रेम ही भक्ति, प्रेम से ही सृष्टि॥
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