मन में एक जिज्ञासा आयी है,
दो समानार्थी शब्दों की चर्चा करते हैं,
दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं,
पर आकाश पाताल का अंतर है ।
स्वभाव से दोनो उल्टे होते हैं,
पर भाई भाई जैसे लगते हैं,
एक को “एकांत” हम पुकारते हैं,
दूसरे को “अकेलापन “ बोला जाता है ।
अकेलापन की पहले बात करे,
यह एक दुखी आत्मा होती है,
अंदर अंदर यह घुटता रहता है
अवसाद में पूरा जीवन जीता है ।
इसका जीवन तो अति दुस्तर है,
बाह्य दुनिया से नाता नहीं रखता है,
छटपटाहट घुटन ही इसकी नियति है,
अन्तर पीड़ा में जीवन जीता है ।
एकांत की तो अपनी महिमा है,
परम आनंद की अनुभूति यह देता है,
मानव के लिये वरदान स्वरूप
प्रभु से सीधा संबंध जोड़ता है ।
एकांत तो एक ऐसा राही है,
जो अपना राह स्वयं ही चुनता है,
अपनी मंज़िल खुद ढूँढता है
तय लक्ष्य को भेद जाता है ।
तपस्वियों का शृंगार है यह ,
इसके बल पर सब गर्वित हैं,
एकांत में समाधिस्थ हो
प्रभु से साक्षात्कार कराता है !