सूनी कोठी

सूनी कोठी करे पुकार

आओ बच्चों मिलने इक बार.

महल खड़ा हुआ आलीशान

ऊँची चोटी भव्य महान

रहते केवल दो ही जान

पड़ोसियों से भी न पहचान

दो वृद्ध अकेले घर में रहते

आशा में जीवन हैं जीते

बच्चे इक दिन आयेगे

कोठी को जगमगायेंगे

सूनी कोठी करे पुकार

आओ बच्चों मिलने एक बार ।

संवेदनायें हो गयी लुप्त प्राय

भावनाओं का हृदय में न है स्थान

वृद्ध अकेले घर में रहते

करते रखवाली जब तक तन में प्राण

साफ़ सफ़ाई झांडू पोंछा करते

एक ही आशा में हैं वे जीते

आयेगें एक दिन मेरे जिगर के लाल

संजो रहे अपने पुरखों की शान

सूनी कोठी करे पुकार

आओ बच्चों मिलने एक बार ।

बडी आशा से बना था यह गृह

पुश्तों दर पुश्तों चमकेगा

नियति अब कुछ अलग कह रही

संशय है पायेगा यथोचित सम्मान

धन वैभव की कमी नही है

सोच बहुत ही बदल गयी है

घुटन भरी ज़िंदगी जी रहा इंसान

आधुनिकता का है यह निशान

सूनी कोठी करे पुकार

आओ बच्चों मिलने एक बार ।

चाँद छू रहा है आज का मानव

पर अपनों से रहता अंजान

ऊँचे सपने, ऊँची छलांग

भरता रहता उन्मुक्त उड़ान

मंहगी घड़ियाँ है हाथों में

पकड़ में एक लम्हा भी नही

मृगतृष्णा में भटक रहे सब

जीवन की सच्चाई से है अंजान

वह सूनी कोठी करे पुकार

आओ बच्चों मिलने एक बार ।

Leave a Comment