पुरानी यादें हैं यादो का क्या भाग चार

पुरानी यादों की चौथी श्रृंखला में

चर्चा दोस्तों की हम करते हैं

कुछ पुरानी मधुर स्मृतियों का

ज़िक्र इस पटल पर करते हैं

छः दशक से ऊपर कब बीत गये

समय पंख फैलाए फिसल गये

समय कहाँ पर रुकता है

यह तो सतत चलता रहता है

इसका आदि अंत नहीं होता है

यह सब कुछ देखता रहता है

साठा अब मैं कहलाता हूँ

वरिष्ठ नागरिक के पद को सुशोभित करता हूँ

अपनी पुरानी यादों में खो जाता हूँ

गड़े मुर्दे उखाड़ कर लाता हूँ

कितने दोस्त आये कितने चले गए

कितने कोरोना महामारी में

काल के गाल में समा गये

सबकी सुंदर यादें हैं

मन को झकोरती रहती है

ईश्वर की महिमा निराली है

उसे कोई समझ नहीं पाया है

आगे पीछे सबको जाना है

सबका एक ही ठिकाना है!

पुरानी यादें हैं यादो का क्या .

दोस्तों की चर्चा शुरू करते हैं

बचपन के छोटी टोली को याद करते है

गाँव के बच्चों की एक टोली थी

या यूँ कहें छोटी मोटी बच्चों की सेना थी

गुल्ली डंडा, छुपन छुपाई,

कंचा गोली, रस्सा कसी,

लंगड़ी टांग, चोर सिपाही,

अखाडे बाज़ी और कबड्डी आदि

सब कुछ तो खेला करते थे

ख़ूब धूम धड़ाका करते थे

बन्दर जैसे उछल कूद हम करते थे

पेड़ों पर चढ़ ज़ाया करते थे

आम बेर और जामुन तोड़ा करते थे

डाल सहित नीचे आ गिरते थे

घर में नहीं बताते थे

डाँट खाने से हम डरते थे

चोट की पीड़ा को चुपके से पी जाते थे

छुप छुप कर घर से भागा करते थे

देर रात तक खेला करते थे

बचपन के दोस्त तो न्यारे होते हैं

वे सबसे प्यारे होते हैं

सब कुछ याद आ जाता है

ऐसा पल अब वापस नहीं आता है ।

पुरानी यादें हैं यादो का क्या .

बचपन छूटा जब बड़े हुये

बचपन के दोस्त सब बिखर गये

कुछ इधर गये कुछ उधर गये

एक दूसरे से सब बिथर गये

घर छोड़कर हम छोटे शहर गये

छोटे शहर छोड़कर बड़े शहर गये

नये नये दोस्तो का साथ मिला

धीरे धीरे घनिष्ठता बढ़ती गयी

एक दूसरे को धीरे धीरे समझ गये

विचारों में समानता संग लाई

तब दोस्ती जमकर गहराई

एक दूसरे के घर की पहुनाई

जीवन में नयी उमंग आयी

ख़ुशियों की एक लहर छायी

नये नये दोस्तो का जब साथ मिला

बचपन की यादें भूल गए

ख़ूब पार्टियाँ हुई, ख़ूब जश्न किये

ख़ूब गाने हुये ख़ूब बजाने हुये

मौज मस्ती के जमकर तराने हुये

शादी व्याह में हम शामिल हुये

एक दूसरे के सुख दुख में साथ खड़े हुये

एक परिवार जैसे हम गले मिले

दोस्ती तो ऐसी ही होती है

यह सबसे न्यारी होती है

सच्चा दोस्त क़िस्मत से मिलता है

वह निःस्वार्थ साथ निभाता है

अपने भले हो जाये पराये है

पर सच्चा दोस्त हमेशा साथ निभाता है

श्रीकृष्ण ने सुदामा से दोस्ती निभाई थी

अर्जुन को गीता का पाठ पढ़ाया था ।

पुरानी यादें हैं यादो का क्या .

कालेज छूटा, आफिस छूटा

नौकरी से हम सेवानिवृत्त हुये

अब घर में मुंह फुलाए ख़ाली बैठे है

कुछ लिखते हैं कुछ पढते है

सोते जागते रहते हैं

बीबी की ताने सुनते हैं

पर मौन साधे रहते हैं

इसी में तो सब भलाई है

अब कौन ड्यूटी जाते हैं

बच्चो के साथ खेलते है

अपना गुजरा बचपन याद आ जाता है

बचपन के दोस्त याद सब आते है

ह्वाटसैप और फ़ेसबुक की अब महिमा है

इसी पर सुप्रभात हम करते हैं

कापी पेस्ट करते रहते हैं

इसी में स्वयम को ज्ञानी समझते हैं

एक दूसरे का लाइक करते है

मिलने से तौबा करते हैं

सब अपने में मस्त रहते है

फ़ोन से काम चलाते हैं

बिजी होने का बहाना बनाते हैं

ऐ मेरे दोस्त ! अब पहले वाली बात कहाँ ?

सब कुछ गुजरा गुजरा लगता है

सब कुछ सपना जैसा लगता है

पटकथा को यही विराम अब देते हैं

सादर प्रणाम हम करते है ।

स्वरचित रचना

Leave a Comment