दो वृद्ध दम्पत्ति

हे प्रियतमा!

उठो, हृदय प्रिय, देर हो गई,

सूर्य रश्मि फैल गई, सब ओर उजियारा छाया।

परिन्दों ने छोड़ा अब अपना बसेरा,

क्यों तू आज पर नहीं उठती?

ब्रह्म मुहूर्त में उठना तेरी पुरानी आदत थी,

नित्य कर्म पूरा कर देती थी चाय मुझे,

आज तेरी आवाज़ नहीं सुनी मैंने,

मेरा मन बार-बार घबरा रहा ।

प्रिय बोल जरा, कुछ तो बता मुझे,

बहुत चिंता है मेरे भीतर।

निशब्द, चेतना शून्य पड़ी जैसे,

आख़िर क्यों तू उत्तर नहीं देती है?

क्यों नाराज़ है तू मुझसे,

तू ही तो है जीवन की मेरी धारा।

मेरे जीवन की डोर है तू,

तुझसे ही महकती मेरी बगिया सारा।

अपनी कह, कुछ मेरी सुन ले,

मेरे जीवन का संगीत है तू।

तेरे धुन पर लहरती हैं मन की तरंगे,

तेरे बिन जीवन का अस्तित्व कहाँ हुआ?

देर हुई, कुछ प्रतिक्रिया न मिली,

अनहोनी का भान हुआ भीतर।

घिसटते-लुढ़कते खाट पर पहुँचा,

पाया तन निष्क्रिय, निष्प्राण सा।

क्रूर नियति अपना खेल खेलती है,

मानव का वश कहाँ चलता है?

बिछुड़ना है एक न एक दिन स्वजनों से,

जीवन संगिनी प्रियतम से विदा लेती है।

रुग्ण पति अकेला, असहाय रह गया,

शेष जीवन का अब क्या प्रयोजन है?

त्याग देती है पत्नी, विछोह में प्राण,

क्रूर नियति अजीब खेल खेलती है।

Leave a Comment