आँखों में आँसू, मन में तड़प है
भरत चले भाई राम को मनाने
त्याग, प्रेम की ज्योत जलाने
भरत चले भाई राम को मनाने॥
अयोध्या शोक में डूबी नगरिया,
सूनी पड़ी हर गली डगरिया।
पशु-पंछी भी मौन हुए,
भरत चले राम को मनाने॥
दशरथ राजा स्वर्ग सिधाए,
राम-लखन-सिया वन को जाए।
भाई बिछोह में मन घबराए,
भरत चले राम को मनाने॥
कृश तन, नंगे पाँव चलें,
हृदय वेदना संग-संग पलें।
अपने को दोषी मानें,
भरत चले राम को मनाने॥
गंगा-यमुना चरण पखारें,
ऋषि-मुनि आशीष उछारें।
गुह निषाद पथ दिखलाएँ,
भरत चले राम को मनाने॥
इंगुदी तले सिया-राम सोए,
देख भरत के नयन भिगोए।
मस्तक धूलि से भर आए,
भरत चले राम को मनाने॥
चित्रकूट में पर्णकुटी,
मंदाकिनी निर्मल धारा बही।
लक्ष्मण शंका छोड़ लजाए,
भरत चले राम को मनाने॥
जग में धन्य यह भातृ-प्रेम,
भरत नाम अमर अनुपम नेम।
देवगण भी स्तुति गाएँ,
भरत चले राम को मनाने॥
आँखों में आँसू, मन में तड़प है
भरत चले भाई राम को मनाने
त्याग, प्रेम की ज्योत जलाने
भरत चले राम को मनाने॥