चार गपोले बैठे थे
आपस में खूब छान रहे,
फेंक रहे ऊँची ऊँची
शेखी अपनी बघारते हैं ।
करते चर्चा बच्चों की
नाते रिश्तेदारों की
महिमा मंडन करते हैं
शान उसी में समझते हैं ।
एक बोला मैंने बोया
चौदह बीघे पुदीना
दूसरा कहता
बीस ट्रक चलवाते हैं ।
तीसरा बोला हमें भी सुन लो
हम किसी से कम नही
एक आवाज़ पर मेरे
सांसद मंत्री घर आते हैं ।
चौथा बैठा शांत भाव से
बोले तो क्या बोले
उसने दिखाया टिकट अपना
ई डी से मिलने हम जाते हैं ।
ऐसे लोगों की कमी नही
गपोली वे कहलाते हैं
दूसरों के मामलों को लेकर
मीनमेख निकालते हैं ।
घर में भूंजी भांग नही
हवा में तीर चलाते हैं
बने चौधरी बिना ताज के
अपनी मूँछ स्वयं ऐंठते हैं ।
अर्थ तंत्र की महिमा देखो
पैसा बोल रहा सर पर,
पढे लिखे बेकार हुये
अनपढ़ राज्य चलाते हैं ।